• ग्यारह नंबर की गाड़ी 

    ग्यारह नंबर की गाड़ी 

    जब उत्तरकाषी के पुरोला में पहली ज्वाइनिंग के लिए गया तो चार पहिया बरसात में बडकोट ही थम गयी बस फिर ग्यारह नम्बर की गाड़ी से ही बड़कोट से खूबसूरत राड़ी का डांडा पार कर पुरोला पहुंचा  और तब से सिलसिला पैदल यात्रा का जारी रहा।

  • पूर्वोत्तर और नागा समस्या

    पूर्वोत्तर और नागा समस्या

    भारत की आजादी के समय तक नागा जीवन उनके समाज के नियमों द्वारा संचालित होता था। वे उन्हीं को आधार बना उसे चलाना चाहते थे। आज भी नागा एक शासन व्यवस्था के अन्दर नहीं लाये जा सके हैं। नागा भूमि तो देशों और भारत के अन्दर अनेक प्रदेशों में बंटी है।

  • सविनय अवज्ञा, पेशावर कांड और गढ़वाल राइफल्स: सामूहिक चेतना की समद्ध विरासत

    सविनय अवज्ञा, पेशावर कांड और गढ़वाल राइफल्स: सामूहिक चेतना की समद्ध विरासत

    भारत की आजादी के संघर्ष में 90 साल पहले 1930 के अप्रैल माह की 23 तारीख को पेशावर के किस्साखानी बाज़ार में हुई एक घटना भारतीय जन की सामूहिक समझ और राष्ट्रीय एकता की एक ऐसी मिसाल पेश करती है जो आज भी अपने अतीत के गौरवशाली पलों को गहराई से समझने के लिए प्रेरित…

  • प्रो. डी.डी. पन्त – एक रहबर की याद

    प्रो. डी.डी. पन्त – एक रहबर की याद

    अंतत: प्रो. डी.डी. पन्त एक बेहतर दुनिया का सपना देखते-देखते इस दुनिया से विदा हो गए। उन जैसे असाधारण जीवन, कर्म, भावनाओं और इरादों को अपनी मामूली कलम से उकेरने के दुस्साहस के बावजूद, हमारा यह प्रयास उनके सानिध्य सुख से उाण होने की एक बचकानी कोशिश भर है।

  • नैनीताल की जोंकें कुछ कह रही हैं

    नैनीताल की जोंकें कुछ कह रही हैं

    नैनीताल के कुछ एक पुराने वाशिंदे आपको आज भी जंगलों में घूमने जाते हुए दिख जाएँगे। ये उनकी पुरानी आदत है। नैनीताल का रहवासी होने कारण मेरी भी आसपास के जंगलों में घूमने की आदत अभी तक बरकरार है। नैनीताल की हर चोटी पर पहुँचने के लिए बटियाऐं बनी हैं । पर नैनीताल में पैदल…

  • वनाग्नि से धधकता उत्तराखंड

    वनाग्नि से धधकता उत्तराखंड

    अरुणाचल के बाद उत्तराखंड के जंगल भारत में सर्वाधिक कार्बन संरक्षण करते हैं। लेकिन हर साल जंगलों में लगने वाली आग से, इस संरक्षित कार्बन का एक हिस्सा तत्काल ही वापस उत्सर्जित हो जाता है। साल दर साल जंगलों में आग की घटनाएं चिंताजनक होती जा रही हैं।

  • लारी बेकर – आम लोगों का असाधारण वास्तुविद

    लारी बेकर – आम लोगों का असाधारण वास्तुविद

    आज से कोई 70 वर्ष पूर्व लारी का मन जिस सोर की वादी में रम गया था, वह वास्तव में बेहद सुंदर थी! दूर-दूर तक काश्त किये खेतों के इर्द-गिर्द उतरते पर्वत ढलानों में बस गये छितरे बनैले गाँव, मध्य में छोटा-सा कस्बा और घाटी में दो फलकों में बहती सर्पिल जल धाराएं। यहां की…

  • मंगलेश दा हैं कहीं हमारे आस-पास

    मंगलेश दा हैं कहीं हमारे आस-पास

    मंगलेश दा के जाने पर पीड़ा ज्यादा ही गहरी और चुभन भरी महसूस हुई। पता नहीं, मैं किस रिश्ते से मंगलेश दा के बारे में सोचता हूँ? अपने कवि के पाठक/श्रोता की हैसियत से या दा के भाई के रूप में या एक गड़बड़ाये जा रहे समाज और देश के एक सह नागरिक के रूप…

  • हिमालय से एक पत्र – इंदिरा गांधी के नाम

    हिमालय से एक पत्र – इंदिरा गांधी के नाम

    पर्यावरण,पारिस्थितिकी के साथ-साथ आज जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी बहस के इस दौर में सस्टेनेबल मिलेनियम डेवलपमेंट गोल को तेजी से प्राप्त करने की चर्चा विश्व पटल में जारी है। एक ओर दुनियां की अधिकाँश व्यवस्थायें पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करने में लगी हैं, दूसरी ओर यही व्यवस्थायें तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन पर चिंता जाहिर…

  • कुमाऊँ में बेगार आंदोलन

    कुमाऊँ में बेगार आंदोलन

    बेगार का सामान्य अभिप्राय मजदूरी-रहित जबरन श्रम था। औपनिवेशिक कुमाऊँ में इसका अभिप्राय मजदूरी-रहित या अल्प मजदूरी देकर कराये गये जबरिया श्रम और जबरन सामग्री लिये जाने की प्रक्रिया से था। बेगार देने के लिए स्थानीय काश्तकारों को बंदोबस्ती इकरारनामों के अनुसार बाध्य किया जाता था।